प्रो एन एल श्रमण -मेमोरी गुरु आफ इंडिया के उत्प्रेरक लेख

Motivational Collection of The Memory Guru of India

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Abstract

प्रेरणा, प्रेरक लाशें केवल सतह पर उतराती हैं, डूबने के लिए जिंदगी चाहिए।

 100 प्रेरक महिलाओं में गुलाबी गैंग‘ की संपत पाल  

 

  दुनिया की शीर्ष 100 प्रेरक महिलाओं में जिन पांच भारतीय महिलाओं को जगह मिली है उनमें बांदा की गुलाबी गैंग का नेतृत्व करने वाली सम्पत पाल देवी भी शुमार हैं। संपत घरेलू हिंसा का विरोध करती हैं। महिला अधिकारों की आवाज उठाने पर उत्तर प्रदेश की पुलिस ने संपत को नक्सली करार देकर जेल भेज दिया था।

दुनिया की शीर्ष 100 प्रेरक महिलाओं की यह सूची समाचार पत्र द गार्जियनने तैयार की है। द गार्जियनने आठ मार्च को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर यह सूची जारी की। इनमें भारतीय महिलाओं में बुकर पुरस्कार विजेता अरुंधति रॉय, मानवाधिकार कार्यकर्ता जयश्री सतपते, पर्यावरणविद वंदना शिवा, महिला अधिकारों के लिए आवाज उठाने वाली अपराजिता गोगोई और संपत पाल देवी शामिल हैं।

संपत पाल देवी बांदा जनपद के कैरी गांव की निवासी हैं। इनके पति बदौसा कस्बे में फुटपाथ पर चाय की एक छोटी सी दुकान चलाया करते थे। संपत पहली बार वर्ष 2006 में उस समय चर्चा में आईं, जब एक महिला उत्पीड़न के मामले में उन्होंने अतर्रा थाने के दरोगा संगमलाल को पेड़ से बांध कर पिटाई कर दी।

उस समय उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) विक्रम सिंह ने गुलाबी गैंग (महिला संगठन) को नक्सली संगठन करार दे सम्पत सहित कई महिलाओं के खिलाफ  मामला दर्ज कर जेल भेज दिया था। 

वर्ष 2007 में फ्रांस की महिला लेखिका मैरी और मार्गों संपत के घर पहुंचीं। इसके बाद फीड्स नामक पत्रिका में संपत की जीवनी छापी। वर्ष 2008 में इन्हीं लेखिकाओं ने संपत के जीवन पर मॉय सम्पतपालकिताब लिखी। वर्ष 2009 में संपत पाल इटली जाकर महिला सशक्तिकरण कार्यक्रम में शामिल हुईं। संपत पाल पर अब तक कई किताबें छप चुकी हैं। 

इस समूह की सभी महिलाएं गुलाबी साड़ी पहनती हैं और इसमें अभी 20 हजार सदस्य हैं। इनके खिलाफ कई आपराधिक मामले भी चल रहे हैं।

                                           

14-year-old Sindhuja at the office of her

animation firm, Seppan

Meet the 14-yr old animator CEO

CHENNAI: Meet 14-year-old Sindhuja Rajaraman, the CEO of Seppan, a Chennai-based animation company launched only in October last. And we’re not kidding. A ninth-standard student, she was adjudged the fastest 2D and 3D animator by software lobby Nasscom at the Gaming and Animation Conclave 2010 at Hyderabad. Interestingly, she is also a brand envoy of design software major Corel Software.

As head of this nascent firm, today she may give tough competition to some of the top CEOs when it comes to taking business decisions, that too quickly. But where did she start?

“It all started five years back when I wanted to take my mind off studies and do something new. My father, who is a cartoonist, instilled in me the passion to do animation and taught me the entire process,” she says. “I have tried my luck with animation even before I started learning it prossfessionally. I did my first mini animation project when I was in sixth standard. It was on ‘do not disturb animals’,” she recalls.

 Early Months

After a few amateur moves last year, Sindhuja made a Guinness Book record attempt for the fastest animation film. The project was for Exnora, a Chennai-based non-profit organisation, to mark the occasion of 10-10-2010. “I created a three-minute animation film in 10 hours. It has gone to the Guinness team and I’m still waiting for them to announce the final results,” she says proudly.

Things started rolling right after that when Sindhuja was offered by First Planet to work as Seppan’s chief executive. With an investment of Rs 10 lakh, First Planet seeded the firm and the entire thing happened within a day. “I did not even know what a CEO meant that time,” she says. And in a shirt span, she is handling three projects – Virtual Street, Garbo.in and First Planet.

The Virtual Street project is about Thyagaraj Nagar, the shopping hub of Chennai where Seppan plans to showcase the entire area through animation while Garbo.in is a job for a Chennai based NGO to promote waste segregation methods.

The third project is for her parent company. “It is a small animation film for freshers who want to join a new company. The film would speak about company etiquette and other things that a fresher should know,” she noted.

  


आठ साल का कंप्यूटर शिक्षक आफताब

संजय परिहार मोतीहारी : द चाइल्ड इज फादर ऑफ द मैन। अपनी कविता द रेनबो में विलियम वडर््सवर्थ की यह उक्ति आठ वर्षीय आफताब पर सटीक बैठती है। कक्षा तीन का यह नन्हा छात्र एक संस्था में कंप्यूटर का प्रशिक्षण दे रहा है। वह छात्रों को एमएस वर्ड, एमएस एक्सल, डाटा इंट्री, एमएस पावर प्वाइंट, विंडो मिडिल प्लेयर, करेक्टर मैंप, वीडियो इंप्रेशन, फोटो इंप्रेशन, पेज मेकर व फोटो शॉप की ट्रेनिंग देता है। वह हिंदी व अंग्रेजी के अल्फाबेट भी सिखाता है। आफताब बड़ा होकर भारतीय प्रशासनिक सेवा में नौकरी करना चाहता है। टेलर मास्टर मुहम्मद आशिक के सात पुत्र-पुत्रियों में सबसे छोटे आफताब को छह साल की उम्र में कंप्यूटर सीखने की ललक जगी। पिता उसे शहर के कांपैक्ट कंप्यूटर एजुकेशन प्वाइंट ले गए। उसकी प्रतिभा देख सेंटर के निदेशक सैयद इम्तेयाज अशरफ ने उसे मुफ्त शिक्षा देने का फैसला किया। चंद माह में ही वह कंप्यूटर में दक्ष हो गया। पिछले एक साल से वह संस्था में छात्रों को कंप्यूटर का प्रशिक्षण दे रहा है। वह पढ़ाने के दौरान काफी सरल भाषा का उपयोग करता है। सेंटर के निदेशक ने बताया कि आफताब एडिशनल डिप्लोमा इन कंप्यूटर एप्लीकेशन में दक्ष है। अमूमन यह डिप्लोमा 10+2 उत्तीर्ण छात्रों को ही दिया जाता है।

 

 सोशल नेटवर्क की दुनिया में नई सनसनी

 

वाशिंगटन, एजेंसी : अमेरिका की 21 वर्षीया कैथरीन कुक ने इन दिनों सोशल नेटवर्क की दुनिया में धूम मचा रखी है। उनकी तुलना फेसबुक के संस्थापक मार्क जुकरबर्ग से की जा रही है। कैथरीन की माइईयरबुक डॉट कॉम के नाम से अपनी सोशल नेटवर्किंग साइट है। उनकी साइट से अब तक ढाई करोड़ लोग जुड़ चुके हैं। उनकी कंपनी की कीमत कुल दो करोड़ डॉलर (करीब 90 करोड़ रुपये) आंकी गई है। कैथरीन को अपनी साइट शुरू करने की प्रेरणा अपने स्कूल की वार्षिक पत्रिका में खराब फोटो के चयन से मिली। उसके बाद उन्होंने अपने भाई डेविड कुक के साथ मिलकर घर बैठे लैपटॉप से सोशल नेटवर्किंग साइट शुरू कर डाली। अब उनकी साइट देश की सर्वाधिक विजिट होने वाली शीर्ष 25 साइटों में शामिल हो गई है। कैथरीन ने अपनी साइट फेसबुक के एक साल बाद 2005 में शुरू की थी। तब से मात्र छह साल में उन्होंने यह मुकाम हासिल किया है। उन्होंने कहा कि 2005 में एक दिन मैं और मेरा भाई स्कूल की वार्षिक पत्रिका में फोटो देख रहे थे। हम दोनों को फोटो का चयन देखकर बहुत गुस्सा आया। हमने सोचा कि काश हम अपनी पसंद के फोटो औरों को दिखा पाते। फिर मेरे भाई ने कहा कि फोटो के साथ हम लोगों से ऑनलाइन बातें भी करें तो कितना अच्छा हो। बस उसके बाद से सिलसिला शुरू हो गया। कुछ दिन बाद ही हमारे पास साइट में निवेश करने के लिए ढाई लाख डॉलर (करीब 1 करोड़ रुपये) का प्रस्ताव आ गया है। 




विनीत वाजपेयी की द स्ट्रीट टू द हाईवे

 

एक युवा जिसके हाथ में सिर्फ 14,000 रुपए और दो किराए पर लिए हुए कंप्यूटर थे आज देश की सबसे बड़ी डिजिटल मीडिया कंपनी खड़ी कर चुका है। मैग्नॉन सॉल्यूशंस के मुख्य परिचालन अधिकारी और संस्थापक विनीत वाजपेयी वह व्यक्ति हैं। वाजपेयी अब अपने जीवन के सभी अनुभवों और संघर्ष को किताब के रूप में पेश करने जा रहे हैं।

मैग्नॉन सॉल्यूशंस के ग्राहकों में कई बड़ी भारतीय कंपनियाँ…भारती, महिंद्रा एंड महिंद्रा, एचसीएल, मारुति और टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज शामिल हैं। दुनिया भर में उसके ग्राहकों में 600 से अधिक कंपनियाँ शामिल हैं। वाजपेयी जल्द ही अपनी किताब द स्ट्रीट टू द हाईवेपेश करने जा रहे हैं।

वाजपेयी ने कहा कि जब मैंने कारोबार शुरू किया था, उस समय मुझे यह बताने वाला कोई नहीं था कि क्या सही है और क्या गलत। मैं काम करते-करते सब सीखा। कई बार मैंने ऐसी गलतियाँ भी की, जिनसे मुझे झटका लगा। मेरी पुस्तक उन लोगों को अपना अनुभव बताने के लिए है, जो कारोबार में सफलता का सपना देखते हैं।

आज वाजपेयी 33 साल के हैं। 22 साल के कॉलेज से निकले छात्र के रूप में उन्होंने अपने करियर की शुरुआत की थी।

उन्होंने कहा कि उस समय मेरे पास सिर्फ 14000 रुपए थे, जो मैंने गर्मी की छुट्टियों में पार्टटाइम नौकरी कर बचाए थे। इसके अलावा दो कंप्यूटर थे, जो किराए पर लिए गए थे। उस समय मैं यहाँ की एक इमारत के सबसे उपरी मंजिल पर बने कमरे जनरेटर रूम में ही जा पाता था।

आज वाजपेयी के पास 150 लोग काम कर रहे हैं। राष्ट्रीय राजधानी और मुंबई में उनके कार्यालय हैं।  


मेमोरी बैंक है 7 साल का जगप्रीत

Jagpreet Singh

अंबाला, (दमनदीप सबरवाल)… आज जर्नलिस्ट टुडे आपको मिलवाने जा रहा है एक ऐसे बच्चे से, जिसकी उम्र हैं तो केवल सात साल लेकिन इसका सामान्य ज्ञान इतना तेज़ हैं की 500 साल पुरानी बात भी यह पलक झपकते ही बता देता हैं इस बच्चे को अगर मेमोरी बैंक कहा जाये तो कम नही , हलाकि सात साल की इस छोटी सी उम्र में बच्चे का अधिकतर समय खेल कूद में बीतता हैं और उन्हें खेलने या खाने के सिवा कुछ भी पता नही होता स्कूल जाने से भी बच्चा जी चुराता हैं लेकिन अंबाला का जगप्रीत उनसे बिलकुल अलग हैं और अपना अधिकतर समय किताबे पढने में और डिस्कवरी जैसे चैनल देख कर अपना समय ज्ञान बढ़ाने में लगा हुआ हैं जिसे देख कर लगता हैं की आने वाले समय में जगप्रीत देश का नाम रोशन करने वाला हैं क्यूंकि पलक झपकते ही वह किसी संसार के किसी भी देश की राजधानी का नाम बता देता हैं और बी.एस.सी तक का कोई भी सवाल आसानी से हल कर देता हैं !

10 अगस्त 2002 को अंबाला में जन्मा जगप्रीत के पिता इंडियन एयर फोर्स में कार्यरत हैं और उसके दादा भारतीय सेना से रिटायर्ड हैं जगप्रीत के पिता जगमोहन सिंह इस समय बेंगलोर में  इंडियन एयर फोर्स को अपनी सेवाए दे रहे हैं जगप्रीत अपनी उम्र के बच्चो से कई गुणा आगे है और उसका सामान्य ज्ञान इतना तेज है की कंप्यूटर को भी मार करे ,सैंकड़ो वर्षो पुरानी कोई बात  का जवाब पाने में आपको कंप्यूटर पर जाकर क्लीक करना पड़ता है या किताबे छाननी पड़ती है लेकिन यह जीनियस हर सवाल का जवाब पलक झपकने से पहले ही एक्सप्लेन कर देता है जगप्रीत के परिवार वाले बताते हैं की जगप्रीत छोटी सी उम्र में ही सामान्य ज्ञान में रूचि लेने लगा था और वो उसका साथ देने लगे और हर जानकारी उसे उपलब्ध करवाई और जगप्रीत ने इसे दिमाग में फिट कर लिया और इसका परिणाम है की जगप्रीत आज किसी जीनियस से कम नही है, जगप्रीत सात साल की उम्र में चोथी कक्षा में बेंगलोर के दिल्ली पब्लिक स्कूल में पढता हैं बेंगलोर के दिल्ली पब्लिक स्कूल (डी.पी.एस) वाले जगप्रीत की योग्यता देख इतना हेरान हुए की उन्होंने जगप्रीत को तुरंत अपने स्कूल में दाखिल कर उसकी स्कूल फीस में भी कटोती कर दी पूरा स्कूल ही नहीं बल्कि जगप्रीत से मिलने वाला हर शख्स जगप्रीत की योग्यता देख हेरान रह जाता हैं क्यूंकि जगप्रीत पलक झपकते ही मुश्किल से मुश्किल सवाल का जवाब दे देता हैं ! जगप्रीत बड़ा होकर साईंटेस्ट बनाना चाहता है

जगप्रीत के पिता का कहना हैं तीन साल की उम्र से ही जगप्रीत का सामान्य ज्ञान बढ़ना शुरू हो गया था और फीफा वर्ल्ड कप दख जगप्रीत देशो की राजधानियों के बारे में जाने के लिए उत्सुक हो गया था जिसके बाद उसने हर देश की राजधानी के बारे अपना ज्ञान बढाया और अब जगप्रीत केवल कुछ ही सेकिंडो में किसी भी देश की राजधानी का नाम बता देता हैं केवल जगप्रीत को विदेशो की राजधानियों के बारे में ही नहीं बल्कि अपने देश के इतिहास के बारे में भी भर पुर ज्ञान हैं जगप्रीत को अलेक्सअंडर के समय से लेकर गुरु नानक देव एव राष्ट्र पिता महात्मा गाँधी तक के बारे में पूरा ज्ञान हैं !


जगप्रीत के मुंह से निकलते फटाफट जवाबों से हम भी हैरान रह गये जो सवाल पूछा उसका जवाब कंप्यूटर से भी तेज जगप्रीत ने हमे दिया ,जगप्रीत से सवाल पूछे हर सवाल का उसने एक दम सही जवाब दिया ,और जगप्रीत ने हमे भी सोच में डाल दिया की उससे क्या सवाल पूछे ! छोटी सी उम्र में सामान्य ज्ञान की इतनी जानकारी रखने वाले जगप्रीत  की इतनी फुर्ती देख हर कोई दांतो तले उंगली दब लेता है !
इतिहास गवाह है की दुनिया में जब भी कोई महान हस्ती पैदा हुई है तो उनके लक्षण छोटी उम्र में ही पता लग जाते है ! आइनस्टाइन,महात्मा गाँधी,जवाहरलाल नेहरु,महारानी लक्ष्मी बाई,इस बात के गवाह है की इन्होने छोटी उम्र में ही बड़े काम कर दिये थे जिस कारण आगे जा कर इनका नाम सुनहरी अक्षरों में लिखा गया था !जगप्रीत का सामान्य ज्ञान देख कर हो सकता है की आने वाले समय में जगप्रीत भी अपने देश का नाम दुनिया में रोशन करे और इसका नाम भी सुनहरे अक्षरों में लिखा जाये



 कल्पना से तो एमबीए भी चकराने लग जाएं

खुदी को कर बुलंद इतना कि हर तकदीर से पहले, खुदा बंदे से खुद पूछे बता तेरी रजा क्या है? शायद यह पंक्तियां कल्पना सरोज जैसी महिला के लिए ही लिखी गई हैं, जो उस बीमार कंपनी को नया जीवन देने का प्रयास कर रही हैं जिसे हाथ लगाने से बड़े-बड़े उद्योगपति भी डर रहे थे। महाराष्ट्र के अकोला जिले में एक दलित परिवार में जन्मी कल्पना सरोज के पिता पुलिस विभाग में हवलदार थे। पांच भाई-बहनों सहित सात सदस्यों के परिवार के लिए दो वक्त की रोटी जुट पाना भी मुश्किल था। शिक्षा बीच में ही छुड़वाकर परिवार की परंपराओं के मुताबिक 12 वर्ष की उम्रमें ही विवाह हो गया। ससुराल मुंबई में थी। झोपड़पट्टी में छोटा सा घर और संयुक्त परिवार। गांव के खुले माहौल से आई बच्ची को यह रहन-सहन बिल्कुल रास नहीं आया और साल भर के अंदर ही विवाह टूट गया। पिता के घर वापस जाने पर फिर से पढ़ाई शुरू हुई। साथ ही जीवनयापन की योजना के तहत सिलाई का काम भी सीखना शुरू कर दिया। लेकिन ससुराल छोड़कर आई किशोरी को कैसी परिस्थितियों से गुजरना पड़ा होगा, इसका अनुमान उस Gासद घटना से ही लगाया जा सकता है, जिसके तहत कल्पना ने एक दिन जहर की तीन शीशियां एक साथ गले के नीचे उतार ली। अस्पताल ले जाया गया। जान बच गई। लेकिन देखने आनेवाले हर शख्स की जुबान पर एक ही बात थी कि अगर मर जाती तो लोग यही कहते कि महादेव की बेटी ने कुछ गलत किया होगा, तभी जान दे दी । दक्षिण मुंबई के बेलार्ड पियर्स स्थित कमानी चैंबर्स के अपने कार्यालय में बैठी कल्पना सरोज के कानों में लोगों के ये ताने आज भी गूंजते रहते हैं । वह कहती हैं कि किसी ने भी उस समय यह पूछने की कोशिश नहीं की कि किन तकलीफों से तंग आकर मैंने आत्महत्या की कोशिश कर डाली। कल्पना ने तभी तय कर लिया कि अब जीना है तो अपनी शर्तो पर, वह भी कुछ करके दिखाने के लिए। लोगों से सुना था कि मुंबई में नौकरी आसानी से मिल जाती है। इसलिए पिता से मुंबई भेजने की जिद की। ससुराल तो छूट ही चुकी थी, इसलिए पिता ने मुंबई में रह रहे एक चाचा के पास रहने की व्यवस्था करवा दी। … 
सिलाई सीख रखी थी, इसलिए दो रुपए रोज की मजदूरी पर एक होजरी के कारखाने में हेल्पर की नौकरी मिल गई। कुछ अच्छे लोगों की संगत में थोड़ी-बहुत पढ़ाई-लिखाई भी हुई, लेकिन दसवीं पास करने का मौका फिर भी (आज तक भी) नहीं मिला। संयोग से दुबारा विवाह हुआ मुंबई के निकट कल्याण शहर में। पति स्टील की सस्ती अलमारियां एवं अन्य वस्तुएं बनाने का व्यवसाय करते थे। उनसे दो बच्चे हुए और पति के निधन से यह साथ भी छूट गया। कम पढ़ी लिखी बेसहारा औरत एवं दो छोटे बच्चे। रोजगार का कोई अनुभव नहीं। इसके बावजूद पति का व्यवसाय ही आगे बढ़ाकर जीविका चलाने की ठान ली। काम चल निकला। पति के समय से भी ज्यादा। बचत भी होने लगी । कुछ पैसे जुटाकर एक ऐसी जमीन का टुकड़ा खरीद लिया जिसपर तमाम अवैध कब्जे थे। किसी तरह कब्जे हटवाकर बैंक से ऋण लेकर एक रिहायशी इमारत बनाकर भवननिर्माण के व्यवसाय में कदम रख दिय। लाभ हुआ तो एक और इमारत बनाई। साथ ही क्षेG के बेरोजगार युवकों कोविभिन्न सरकारी योजनाओं का लाभ दिलवाकर रोजगार शुरू करने में भी मदद की । धीरे-धीरे छवि ऐसी बनती गई कि जब आजादी के दौर के एक प्रसिद्ध व्यावसायिक घराने की कंपनी कमानी टयूब्स लिमिटेड डूबने लगी और बीआईएफआर (बोर्ड फार इंडस्टि्रयल एवं फाइनेंशियल रिकंसट्रक्शन) ने इसे संभालने के लिए किसी को आगे आने का प्रस्ताव रखा तो कल्पना के पड़ोस में रहने वालेकंपनी के कुछ कर्मचारी उनके पास इस उम्मीद से जा पहुंचे कि वही इस कंपनी को संभाल सकती हैं। बंद पड़ चुकी कमानी टयूब्स लिमिटेड। उस पर 116 करोड़ रुपयों का कर्ज। 120 से ज्यादा मुकदमे। 500 से ज्यादा कर्मचारियों के बकाया देय। और दो यूनियनें। इनमें से एक कर्मचारी संगठन एक बार बीआईएफआर से कंपनी की कमान संभालकर असफल भी हो चुका था । दूसरी ओर कल्पना को कंपनी चलाने का कोई अनुभव नहीं। इसके बावजूद हिम्मत बांध ली। क्योंकिसवाल खुद के लिए पैसा कमाने का नहीं, बल्कि कंपनी बंद होने से बदहाल हो रहे कर्मचारियों के भविष्य का था। 10 लोगों का एक समूह बनाकर कंपनी चलाने की रूपरेखा तैयार की और बीआईएफआर के सामने हाजिर हो गई। बीआईएफआर ने वर्ष 2000 में उनके कंपनी चलाने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी। उन्हें छह साल लगे कंपनी के वित्तीय पचड़ों को सुलझाने में। ऋणदाता बैंकों से कई दौर की बातचीत करके ऋण की राशि 116 करोड़ से घटाकर 40 करोड़ तक लाने में कामयाब रहीं। कंपनी छोड़कर जानेवाले 566 कर्मचारियों को कुल 8.5 करोड़ रुपयों की एकमुश्त अदायगी की । 21 मई, 2006 को कमानी टयूब्स लिमिटेड की चेयरपर्सन का दायित्व संभालनेवाली कल्पना सरोज अब बेलार्ड पियर्स स्थित अपने जिस कार्यालय में बैठती हैं, वह अनिल अंबानी के स्वामित्ववाले रिलायंस सेंटर से चंद कदमों की दूरी पर वाडिया हाउस के ठीक सामने स्थित है। इस मार्ग का नाम ही कमानी रोड है। कल्पना के विश्र्वस्त सहयोगी एवं कंपनी के प्रबंध निदेशक एमके गोरे बताते हैं कि नए प्रबंधन में आने के बाद अपने पहले उत्पादन वर्ष में ही कंपनी ने 375 से 500 करोड़ रुपयों के बीच व्यवसाय का लक्ष्य निर्धारित किया है। यदि कल्पना सरोज की यह कल्पना सफल हो सकी तो यह न सिर्फ उनके जीवन की, बल्कि बीआईएफआर के अब तक के इतिहास की भी अजूबी घटना साबित होगी। संभव है, तब कई एमबीए दांतों तले उंगली दबाकर कल्पना से उनकी सफलता का राज पूछते नजर आएं
 
 
सिलाई सीख रखी थी, इसलिए दो रुपए रोज की मजदूरी पर एक होजरी के कारखाने में हेल्पर की नौकरी मिल गई। कुछ अच्छे लोगों की संगत में थोड़ी-बहुत पढ़ाई-लिखाई भी हुई, लेकिन दसवीं पास करने का मौका फिर भी (आज तक भी) नहीं मिला। संयोग से दुबारा विवाह हुआ मुंबई के निकट कल्याण शहर में। पति स्टील की सस्ती अलमारियां एवं अन्य वस्तुएं बनाने का व्यवसाय करते थे। उनसे दो बच्चे हुए और पति के निधन से यह साथ भी छूट गया। कम पढ़ी लिखी बेसहारा औरत एवं दो छोटे बच्चे। रोजगार का कोई अनुभव नहीं। इसके बावजूद पति का व्यवसाय ही आगे बढ़ाकर जीविका चलाने की ठान ली। काम चल निकला। पति के समय से भी ज्यादा। बचत भी होने लगी । कुछ पैसे जुटाकर एक ऐसी जमीन का टुकड़ा खरीद लिया जिसपर तमाम अवैध कब्जे थे। किसी तरह कब्जे हटवाकर बैंक से ऋण लेकर एक रिहायशी इमारत बनाकर भवननिर्माण के व्यवसाय में कदम रख दिय। लाभ हुआ तो एक और इमारत बनाई। साथ ही क्षेG के बेरोजगार युवकों कोविभिन्न सरकारी योजनाओं का लाभ दिलवाकर रोजगार शुरू करने में भी मदद की । धीरे-धीरे छवि ऐसी बनती गई कि जब आजादी के दौर के एक प्रसिद्ध व्यावसायिक घराने की कंपनी कमानी टयूब्स लिमिटेड डूबने लगी और बीआईएफआर (बोर्ड फार इंडस्टि्रयल एवं फाइनेंशियल रिकंसट्रक्शन) ने इसे संभालने के लिए किसी को आगे आने का प्रस्ताव रखा तो कल्पना के पड़ोस में रहने वालेकंपनी के कुछ कर्मचारी उनके पास इस उम्मीद से जा पहुंचे कि वही इस कंपनी को संभाल सकती हैं। बंद पड़ चुकी कमानी टयूब्स लिमिटेड। उस पर 116 करोड़ रुपयों का कर्ज। 120 से ज्यादा मुकदमे। 500 से ज्यादा कर्मचारियों के बकाया देय। और दो यूनियनें। इनमें से एक कर्मचारी संगठन एक बार बीआईएफआर से कंपनी की कमान संभालकर असफल भी हो चुका था । दूसरी ओर कल्पना को कंपनी चलाने का कोई अनुभव नहीं। इसके बावजूद हिम्मत बांध ली। क्योंकिसवाल खुद के लिए पैसा कमाने का नहीं, बल्कि कंपनी बंद होने से बदहाल हो रहे कर्मचारियों के भविष्य का था। 10 लोगों का एक समूह बनाकर कंपनी चलाने की रूपरेखा तैयार की और बीआईएफआर के सामने हाजिर हो गई। बीआईएफआर ने वर्ष 2000 में उनके कंपनी चलाने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी। उन्हें छह साल लगे कंपनी के वित्तीय पचड़ों को सुलझाने में। ऋणदाता बैंकों से कई दौर की बातचीत करके ऋण की राशि 116 करोड़ से घटाकर 40 करोड़ तक लाने में कामयाब रहीं। कंपनी छोड़कर जानेवाले 566 कर्मचारियों को कुल 8.5 करोड़ रुपयों की एकमुश्त अदायगी की । 21 मई, 2006 को कमानी टयूब्स लिमिटेड की चेयरपर्सन का दायित्व संभालनेवाली कल्पना सरोज अब बेलार्ड पियर्स स्थित अपने जिस कार्यालय में बैठती हैं, वह अनिल अंबानी के स्वामित्ववाले रिलायंस सेंटर से चंद कदमों की दूरी पर वाडिया हाउस के ठीक सामने स्थित है। इस मार्ग का नाम ही कमानी रोड है। कल्पना के विश्र्वस्त सहयोगी एवं कंपनी के प्रबंध निदेशक एमके गोरे बताते हैं कि नए प्रबंधन में आने के बाद अपने पहले उत्पादन वर्ष में ही कंपनी ने 375 से 500 करोड़ रुपयों के बीच व्यवसाय का लक्ष्य निर्धारित किया है। यदि कल्पना सरोज की यह कल्पना सफल हो सकी तो यह न सिर्फ उनके जीवन की, बल्कि बीआईएफआर के अब तक के इतिहास की भी अजूबी घटना साबित होगी। संभव है, तब कई एमबीए दांतों तले उंगली दबाकर कल्पना से उनकी सफलता का राज पूछते नजर आएं

दलित लड़का न जाने कैसे बना ‘अंग्रेज’


सहारनपुर के एक सुदूरवर्ती गांव का दलित लड़का अचानक अंग्रेज बन गया है। बिना किसी मदद के 14 साल का राजेश हिंदी भूलकर अब सिर्फ अंग्रेजी बोलता है। यही नहीं , उसका अंग्रेजी उच्चारण भी पूरी तरह अमेरिकी है। अंग्रेजी के साथ-साथ उसकी भौतिकी और गणित की जानकारी भी चौंका देने वाली है। पहले से ही 3 किताबें लिख चुके राजेश अब कुछ शोध कार्य करने में जुटे हैं।

 यह सब कुछ एक बॉलिवुड फिल्म की पुनर्जन्म की कहानी जैसा लग सकता है लेकिन राजेश इससे इनकार करते हैं। उनका कहना है कि यह सिर्फ अच्छी मेमरी ही है जिसे तब तक नष्ट नहीं किया जा सकता है जब तक इस दुनिया में साउंड वेव्स हैं। और यही विषय राजेश का पसंदीदा भी है।

पिछले साल विलियन जैफरसन क्लिंटन साइंस एंड टेक्नॉल्जी सेंटर में दाखिल हुए राजेश के प्रिंसिपल शिशु पाल वर्मा का कहना है कि शुरू में उन्होंने उस पर कोई खास ध्यान नहीं दिया , लेकिन गणतंत्र दिवस के मौके पर उसके धाराप्रवाह अंग्रेजी भाषण ने सबको सोचने पर मजबूर कर दिया।

राजेश की मां ओमकली और भाई कलुआ मजदूरी का काम करते हैं और किसी प्रकार दो जून की रोटी का जुगाड़ कर पाते हैं। उनके पिता सोमपाल मानसिक रूप से विक्षिप्त हैं। राजेश की मां से जब यह पूछा गया कि अचानक वह कैसे बदल गया तो उन्होंने बताया कि करीब साल भर पहले एक दीवार उठाते समय उसने अपने पिता के ऊपर ईंट से प्रहार कर दिया , जिससे बहे खून ने उसे स्तब्ध कर दिया। अगले 3 माह तक वह किसी से कुछ भी नहीं बोला , और जब बोला तो वह सिर्फ अंग्रेजी !

सबसे कम उम्र की पोस्ट ग्रेजुएट ने कहा

अपने सपनों को जरुर साकार करूंगी
16 वर्ष की रश्मि स्वरूप का जन्म राजस्थान के बारां जिले के जैपला गांव में 29 सितम्बर 1992 को हुआ था। उसके मम्मी- पापा, श्री आर. एस. वर्मा और श्रीमती प्रभा स्वरुप यहां  के पहले शिक्षित दम्पति हैं। ज़ाहिर है उसके दादा- दादी और नाना- नानी अपने समय से बहुत आगे थे। रश्मि स्वरूप 9 वर्ष की आयु में दसवीं प्रथम श्रेणी से, 11 वर्ष की आयु में 12वीं जीव विज्ञान (biology) और 15 वर्ष में विज्ञान स्नातक (B.Sc.) करके राजस्थान की सबसे कम उम्र 16 वर्ष में M.Sc.करने वाली पहली छात्रा बनी। रश्मि स्वरूप ने पिछले दिनों ऑनलाइन हमारे सवालों के जवाब दिए, प्रस्तुत है कुछ अंश :
आपने इतनी कम उम्र में यह सब कैसे हासिल कर लिया?
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मुझे स्कूलों के लम्बे- लम्बे होमवर्क से बड़ी कोफ्त होती थी। मुझे बेवजह कागज़ काले करने में कोई रूचि नहीं थी। मैं जल्दी ही अपनी पढ़ाई ख़त्म कर लेना चाहती थी। उन्ही दिनों पापा के पास कुछ दसवी की लड़कियां गणित पढऩे आती थी। मुझे अपने होमवर्क से अधिक आसान तो उनके गणित के घुमावदार सवाल लगते थे जिन्हें मैं उन लड़कियों से पहले हल कर लिया करती थी। उन्ही दिनों बिहार के एक छात्र तथागत तुलसी के बारे में अखबार में आ रहा था। पापा ने जब इसके बारे में बताया तो मुझे नहीं लगा इसमें कोई मुश्किल हो सकती है। पापा ने प्रस्ताव रखा की यदि में एक महीने में बीजगणित हल कर दू तो मंै भी ऐसा कर सकती हूं, चुनौतियां तो मुझे वैसे भी प्यारी थी। और फिर मुझे पांच सालों की पढ़ाई से मुक्ति मिल रही थी और पास होने पर कंप्यूटर भी मिलने वाला था। मैंने दसवी पास की और फिर मेरे लिए अनगिनत दरवाज़े खुल गए। मेरे पास समय और ऊर्जा दोनों थे। अपने माता पिता के मार्गदर्शन में और अपनी रूचि के अनुसार मैंने इसका उपयोग करने की ठान ली। केवल प्रसिद्धि मेरा उद्देश्य कभी नहीं था। जब- जब मुझे असाधारण माना गया मैंने इससे जुड़ी जि़म्मेदारी का अनुभव किया। मैं बचपन से अपने औटिस्टिक भाई प्रतीक के लिए कुछ करना चाहती थी। पर मैंने अनुभव किया की न केवल उसके लिए बल्कि देश के 3′ और इतने ही विश्व के मैंटली रिटायर्ड बच्चों के लिए बहुत कुछ किया जाना बाकी है। अब इन बच्चों को मुख्य धारा में लौटा लाना ही मेरा ध्येय है।
आपकी पढ़ाई में आपके माता पिता का सहयोग कितना रहा?
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बहुत। मुझ पर कभी पढाई या किसी भी चीज़ का दबाव नहीं रहा न ही कभी लड़की होने के कारण मैंने उनके व्यवहार में कोई अंतर पाया। बल्कि लड़की होना उनके लिए सौभाग्य की बात थी। मैं हर काम के लिए स्वतंत्र थी। मेरे माता पिता ने ही मेरी प्रतिभा और रूचि को पहचाना, निखारा, मुझे भी इस बात का अहसास दिलाया और मुझमें विश्वास दिखाया। और यही मेरे लिए सबसे बड़ी बात रही।  
क्या आप इसके लिए कोई ट्यूशन लेती थी?
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नहीं। दसवी में गणित और विज्ञान मैंने पापा से और गुजराती, हिंदी, इंग्लिश और सामाजिक विज्ञान मम्मी से पढ़े। मैं जानती ही नहीं कि किस तरह चतुराई से मुझे पांच सालों का कोर्स एक साल में इतनी आसानी से पढ़ाया गया। पढ़ाई मेरे लिए खेल और नयी चीजे जानने से अधिक कुछ नहीं रही। मुझे मेरे विषय रोचक लगते रहे और जल्द ही मैं खुद पढऩे लगी। मैं तो कहती हूं सीखने को इतना कुछ है पांच साल कि बचत कुछ अधिक नहीं। 
कम उम्र के बाद भी आपको ऊंची कक्षाओं में परीक्षा देने की अनुमति कैसे मिली?
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माध्यमिक शिक्षा बोर्ड राजस्थान के दूरस्थ शिक्षा विभाग द्बारा ओपन स्कूल के माध्यम से मुझे ये सुविधा मिली। इसमें कोई आयु सीमा नहीं थी और कितने भी प्रयासों में दसवीं पास कि जा सकती थी। लेकिन मैंने एक ही प्रयास में 62 प्रतिशत अंकों के साथ दसवीं प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण की। साथ ही इंग्लिश और गुजराती में डिक्टेशन भी हासिल किया। इसके बाद नियमित छात्रा के रूप में जीव विज्ञान विषय लेकर हायर व सीनियर सेकंड्री प्रथम श्रेणी 62  प्रतिशत अंकों के साथ ही उत्तीर्ण की। इसके बाद कॉलेज में एडमिशन में भी कोई परेशानी नहीं आई और मैंने स्नातक और प्राणी विज्ञान में स्नातकोत्तर भी नियमित छात्रा के रूप में ही किया। 
आप कितने भाई बहन है उनमें से कौन आपकी तरह प्रतिभाशाली है?
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मेरे दो भाई हैं। 13 वर्षीय प्रतीक जो autistic है और मीनू मनोविकास मंदिर, चाचियावास, अजमेर में पढ़ता है और वहां रहकर तेजी से रिकवर हो रहा है। दूसरा भाई रवि 8 साल का है और केंद्रीय विद्यालय नं. 1 में फिफ्थ क्लास में पढ़ता है, और उसका तो जैसे जीवन का एकमात्र उद्देश्य ही दीदी के सब रेकॉर्ड्स तोड़ डालना है, वह मेधावी छात्र है, उसे क्रिकेट बेहद पसंद है और वह पायलट बनना चाहता है। वैसे मेरी तरह क्लासेस जम्प करने कि उसकी कोई योजना नहीं!

 क्या आपको ऐसी प्रतिभा अपने माता या पिता से मिली है?
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बेशक! आखिर जूलॉजी की स्टुडेंट हूं, जानती हूं कि माता- पिता के अनुवांशिक गुण तो मुझमें आयेंगे ही! मेरे माता- पिता ने भी हमेशा लीक से हटकर काम किये है और यही ज़ज्बा मुझे विरासत में मिला है। दादा- दादी और नाना- नानी के अशिक्षित होने के बावजूद भी उन्होंने पूरी शिक्षा प्राप्त की और अब भी वे अपने गांव के  प्रथम शिक्षित दम्पति हैं। और उन्होंने अपनी शिक्षा का पूरा उपयोग भी किया। मेरे माता पिता प्रगतिशील विचारधारा के हैं और हमेशा समाज के घोर विरोध के बावजूद प्रगति करते रहे। लोगों की नजऱों में वे अब भी मुझे (लड़की को) पढ़ाकर और प्रतीक (भाई) में पैसा लगाकर वे धन और समय व्यर्थ ही कर रहे हैं!  
कम उम्र में इतना ज्ञान हासिल करके क्या आपको ऐसा लगता कि आपने बचपन में बड़ों की तरह सोचना शुरू कर दिया है?
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नहीं। बल्कि दूसरे बच्चों की सोच अब तक मैच्योर नहीं हुई, मुझे लगता है, आखिर हम ही तो देश का भविष्य हैं! हम नहीं सोचेंगे तो फिर कौन सोचेगा। मैं तो सोचती हूं ये सोचने वाला कीड़ा हर एक के दिमाग में घुसा देना चाहिए! (लेकिन अगर उनमें इतना दम है तो ही, बेवजह बच्चों पर दबाव डालने के भी मैं खिलाफ हूं।  मेरी  नजऱ में बच्चों का दिमाग भी तो एक प्राकृतिक रिसोर्स ही है। शिव खेड़ा जी ने कहा है की यदि हर व्यक्ति समाज और प्रकृति से जितना पाते हैं उससे अधिक लौटाने की ठान ले तो फिर देश के विकास को कोई रोक नहीं सकता।) लेकिन ऐसा बिलकुल नहीं है कि मैं किसी भी तरह के दबाव में हूं। आखिर कौन नहीं चाहेगा ख़ास होना बशर्ते वे ऐसा कर सकें।
आपके दोस्त आपकी उम्र के हैं या आपकी डिग्री के अनुसार बड़ी उम्र के?
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मेरी एक सबसे अच्छी दोस्त रागिनी मेरी ही हमउम्र हैं और बाकी सभी मुझसे बड़े हैं (लेकिन मानसिक स्तर में मैंने कोई अंतर नहीं पाया, दोस्ती में उम्र वैसे भी कोई मायने नहीं रखता। वैसे मुझे लोगों के  मानसिक स्तर में इजाफा करने का शौक है!

 

पढऩे वालों बच्चों को आप क्या टिप्स देना चाहेंगी?
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हमारे पूर्व राष्ट्रपति महामहिम डॉक्टर एपीजे अब्दुल कलाम ने कहा है की सपना वह नहीं जो सोने के बाद आये बल्कि सपना वह है जो आपको सोने ही न दे। बस देख लीजिये अपने लिए भी कोई सपना, बड़ा सोचिये और उसमें जुट जाईये। अपने लिए, अपने परिवार, समाज और देश के लिए, बिना किसी बाहरी दबाव के। अपनी अन्त: प्रेरणा को महसूस कीजिये। अपनी रूचि के काम कीजिये और उसमें बेहतरीन प्रदर्शन करके ये साबित कर दीजिये कि वह वास्तव में आपकी रूचि है। अपनी, और बहुत जरुरी है कि  दूसरों कि गलतियों से भी सीखे। हर असफलता को एक सीख समझे और इसे संकेत समझे कि आपसे सिर्फ कुछ बेहतर कि उम्मीद कि जा रही है। बेस्ट ऑफ़ लक!
  अब आगे आप क्या करना चाहती हैं?
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इस वर्ष मैंने जूलॉजी में एमएससी कर लिया है। आगे मैं एमफिल या पीएचडी करना चाहती हूं। साथ ही अपनी पुस्तक जूही और मिरेकल लैंडका दूसरा भाग जूही और मिम्सभी लिख रही हूं। बाकी प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए अभी मैं छोटी हूं। नेट जिसकी एज लिमिट 19 वर्ष है और आईएएस जिसकी एज लिमिट 21 वर्ष है, भविष्य में दूंगी। आगे मैं रिसर्च करना चाहती हूं ताकि मैंटली रिटायर्ड और autistic बच्चों से सम्बंधित क्षेत्र में विज्ञान में बढ़ोतरी कर सकूं। 

गोल्डन चाइल्ड

 सफलता कभी भी हासिल की जा सकती है। इसके लिए एक निर्धारित उम्र का दायरा नहीं तय किया जा सकता। इसकी मिसाल है आईआईटी मद्रास से कंप्यूटर साइंस में गोल्ड मेडलिस्ट एस. चंद्रशेखर। महज 17 वर्ष की आयु में यह उपलब्धि हासिल करने वाले भारत के सबसे कम उम्र के एमटेक डिगरी धारक हैं। जिस उम्र में विद्यार्थी कॉलेज में प्रवेश ही करते हैं, उस उम्र में उन्होंने यह करिश्माई सफलता हासिल कर युवाओं के सामने एक बेहतरीन मिसाल कायम की है। 

अपने परिवार और दोस्तों के बीच ‘गोल्डन चाइल्ड ’ कहे जाने वाले चंद्रशेखर के लिए शायद यह उपलब्धि चौंकाने वाली न हो। इस मुकाम पर पहुंचने से पहले वह विश्व के सबसे कम उम्र के माइक्रोसॉफ्ट सर्टिफाइड प्रोफेशनल (एमसीपी) होने का गौरव भी हासिल कर चुके हैं। महज नौ साल की उम्र में उन्होंने यह उपलब्धि हासिल की थी। दस साल की उम्र में एमसीएसई और अगले साल सीसीएनए किया। हैरानी की बात तो यह है कि यह उपलब्धि उन्होंने उस वक्त हासिल की जब वह छठीं कक्षा में पढ़ रहे थे। इस समय उनकी आयु महज 11 वर्ष थी। उम्र के जिस पड़ाव पर अधिकांश विद्यार्थी कम्प्यूटर सीखना शुरू ही करते हैं, वह उपलब्धि की दुनिया में बुलंदियां छू रहे थे। अपनी सफलता के बारे में एस.चंद्रशेखर का मानना है कि यह सब होता गया। इसके लिए उन्होंने कोई विशेष प्रयास नहीं किया लेकिन उन्हें अपने स्कूल से हर संभव मदद मिला, जिस वजह वह इतनी ऊंचाई पर पहुंच सके। 

उनकी कामयाबी की कहानी तब और भी दिलचस्प हो जाती है जब चंद्रशेखर ने छठीं कक्षा के बाद सीधा इंजीनियरिंग में दाखिला पाया। इसमें उनकी उम्र जरूर आड़े आई लेकिन उनकी अविश्वसनीय प्रतिभा ने इस बाधा को भी लांघ दिया। इंजीनियरिंग के लिए वह योग्य हैं या नहीं, इसके लिए अन्ना यूनिवर्सिटी की छह सदस्यीय कमिटी ने उनकी परीक्षा ली। इस परीक्षा में वह खरे उतरे। रतन टाटा, टीसीएस के रामादुरई और इन्फोसिस के नारायणमूर्ति को अपना आदर्श मानने वाले चंद्रशेखर की सफलता की भूख अभी भी शांत नहीं हुई। एक और बड़ी उपलब्धि उनके नाम के साथ तब जुड़ गई जब उन्होंने 2006 में ग्रेजुएट एप्टीट्यूड टेस्ट में 99.32 परसेंटाइल अंक प्राप्त किए और मद्रास, आईआईटी में एमटेक कंप्यूटर साइंस में दाखिला लिया। टीसीएस कंपनी में रिसर्चर की नौकरी कर रहे चंद्रशेखर भविष्य में देश के लिए कुछ करने का ख्वाब रखते हैं।

 छ: साल का नन्हा दिव्य बना इग्नू छात्र

कहते है की पूत के पांव पालने में ही नजर आ जाते हैं, कुछ ऐसे ही लक्षण छह साल के नन्हे दिव्य प्रकाश पांडे में नजर आ रहे हैं।

दिल्ली के इस छात्र ने इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय में महज छह साल में ही दाखिला लेने का गौरव हासिल कर विश्वविद्यालय का सबसे कम उम्र का पहला विद्यार्थी बन गया है। दिव्य अब इग्नू से शिल्प व डिजाइन कोर्स कर अपनी मिट्टी से खेलने के शौक को हुनर में तब्दील कर सकेगा।

महज 6 साल की उम्र में जब बच्चे खिलौनों से खेलते हैं ऐसे में प्रतिभा के धनी इस बच्चे ने मिट्टी (क्ले) से खेल कर कैरियर बनाने की तैयारी शुरू कर दी है। वह अपने कोर्स के जरिए मृदा जगत में वॉटर ऑफ इंडिया नाम से प्रसिद्ध जादुई खेल (मैजिक ट्रिक) का डिजाइन विकसित करना चाहता हैं। 

इग्नू के जनसंपर्क अधिकारी रवि मोहन के मुताबिक अनुक्रमांक संख्या 100164484 आवंटित दिव्य शिल्प और डिजाइन में आश्चर्य और जादुई करिश्मा दिखाने को महत्वकांक्षी है। वह शिल्प और डिजाइन (कुंभकारी) में दाखिला लिया है। विश्वविद्यालय प्रवक्ता की माने तो इग्नू के इतिहास की यह पहली घटना है जब इतनी छोटी उम्र के किसी छात्र ने यहां दाखिला लिया है। 

रविमोहन ने दिव्य के दाखिले के विषय में जानकारी देते हुए बताया कि इंजीनियरी एवं प्रौद्योगिकी विद्यापीठ का 6 माह का अंग्रेजी एवं हिंदी माध्यम का यह पाठ्यक्रम प्रकार्यात्मक रूप से साक्षर लोगों के लिए संचालित किया जाता है। 

इसमें छात्रों को क्ले (मृदा जगत) गतिशील मृदा रूप, स्थिर मृदा रूप, तथा डिजाइन और विपणन की समझ प्रदान की जाती है। इस कोर्स में प्रश्नों का समाधान करने के लिए अध्ययन केंद्रो तथा रेडियो एवं दूर परामर्श से 6 परामर्श सत्रों का आयोजन किया जाता है। इसमें तीन प्रकार के व्यवहारिक सत्र होते हैं।                             

  14 साल की उम्र में आईआईटी में प्रवेश

आईआईटी कानपुर में मात्र 14 वर्ष की उम्र में एमएससी में प्रवेश लेने वाले सबसे कम उम्र के दिल्ली के छात्र सहल कौशिक ने साबित कर दिया है कि यदि मन में कुछ करने की ठान लें तो मंजिल कदमों में होगी।

दिल्ली के वंदना इंटरनेशनल स्कूल से इंटर में भौतिकी, रसायन शास्त्र और गणित में 78 फीसदी अंक पाने वाले सहल ने इस वर्ष आईआईटी की प्रवेश परीक्षा में पूरे देश में 33वां स्थान प्राप्त किया। उसने आईआईटी कानपुर के पांच साल के अंडर ग्रेजुएट कोर्स एमएससी में प्रवेश लिया है। 

The greatest motivational act one person can do for another is to listen.

Robert E. Moody


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